Posts

Showing posts with the label # डायरी
Image
 घुटन भरे माहौल में श्वास  कल रात मराठी की बेहद मर्मस्पर्शी फिल्म "श्वास" देखी - बहुत दिनों बाद कोई मराठी फिल्म देखी। यह फिल्म मैंने दोबारा देखी, पहली बार तब देखी थी भारत की तरफ से  2004 में ऑस्कर के लिए नामित किया गया था.... इसका डी वी डी नागपुर से मंगा कर देखी थी।वास्तविक घटना पर आधारित यह फिल्म माधवी घरपुरे की कहानी पर बनी है जिसे संदीप सावंत ने निर्देशित किया है - बेहद सजीव अभिनय,सुंदर स्थलों पर की गई नयनाभिराम फोटोग्राफी और बेहद प्रभावशाली पार्श्व संगीत फ़िल्म के प्रभाव को बढ़ाते हैं।  कोरो ना की वजह से जिस तरह की घरेलू कैद में हम लोग बंद हैं और बाहर की दुनिया से सिवाय टीवी या सोशल मीडिया के हमारा संपर्क टूटा हुआ है, तब यह फिल्म देखना खुली हवा में सांस लेने जैसा था - सिर्फ शाब्दिक अर्थों में नहीं बल्कि दृश्यात्मक और गतिमान अर्थों में। नदी पहाड़ जंगल इंसान पेड़ पौधे पशु पक्षी इन सब के साथ सहज भाव से मिलना जुलना कितना आह्लादकारी था यह शब्दों में बयान करना मुश्किल है।  फिल्म एक छोटे बच्चे और उसके नाना के बेहद आत्मीय संबंधों पर आधारित है। बच्चे की आंख में कुछ स...
                                          भाषाएँ अकारण   चुप या मुखर नहीं होतीं      पिछले हफ़्ते की बात है मैं हरियाणा के एक शहर में था - मौसम ख़तम होने के बाद जब   फलों की मंडी में खूब बड़े बड़े आम दिखे तो मैंने पूछा कौन सा आम है - चौसा , जवाब मिला। मुझे उत्तर भारत के   आमों   की प्रमुख प्रजातियों के बारे में इतना तो मालूम था कि दूकानदार सही नहीं बता रहा   मुझे बहला रहा है।चार पाँच दूकानों पर घूमते हुए   मैंने नाम   पूछा - सब ने यही जवाब दिया जैसे उन्हें एक ही बात बोलने की हिदायत दी गयी हो। मेरी स्मृति में लगभग   चार साल पहले   की हरियाणा के ही   एक शहर की घटना सजीव थी जब    दुकानदार ने इसी मौसम में ऐसे ही रंग रूप और आकार के आम को बड़े गर्व से पाकिस्तानी आम कह कर बेचा था। इस बार   मेरे मन में उन आमों के पाकिस्तानी आम होने को लेकर   कोई संशय नहीं था पर देश और प्रदेश की दिनों दिन बहुसंख्यक भीड़तंत्र के...
                                                            अंधेरा है पर उतना घना नहीं यूँ ही बैठे बैठे अखबार देखते हुए या टीवी पर समाचार देखते हुए यह ख्याल आया कि इतनी हिंसा, आक्रामकता, बेईमानी और दूसरों को नीचा दिखाने के भाव मन में पसर जाते हैं कि मुँह का स्वाद तो कसैला हो ही जाता है,भारतीय समाज और व्यापक तौर पर इंसानियत के बुनियादी सरोकारों पर से भरोसा उठने लगता है - सभी दिशाओं में अंधेरा ही अंधेरा दिखाई देने लगता है।सोचने लगा साठ साल के जीवन में अम्मा पिताजी और स्कूल मास्टर के बाद ऐसा कौन है जिसने मुझे मारा,अबतक जिंदा हूँ तो जाहिर है किसी के कत्ल करने से तो बचा हुआ हूँ।स्कूल में भी नाम का दो तीन बार पढ़ाई से इतर कारणों से मार खाई होगी...विद्यार्थी ठीक ठाक से ऊपर का था।सोचने पर जैसे मुझे हुआ मित्रों को भी जान के अचरज होगा कि इतने सालों में सिर्फ़ एकबार वह भी इंजीनियरिंग कॉलेज (हाँ,भागलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज की बात है) के फ़र्स्ट या सेकंड ईय...
  सपने में नहीं सच में बैडमिंटन खेल रही थीं लड़कियाँ  हर बार हम काठगोदाम से अल्मोड़ा होते हुए अपने प्रोजेक्ट के काम से पाताल भुवनेश्वर जाते थे ,एक बार काठगोदाम में ट्रेन से उतर कर हमअपने पुराने रास्ते से  नहीं गये बल्कि कान को हाथ घुमा कर पकड़ा -- भवाली से धानाचुली, शहर फाटक ,दोल आश्रम ,चिन्याली चिना ,दन्या ,पनारघाट ,गंगोलीहाट होते हुए पाताल भुवनेश्वर पहुँचे। मुझे सही सही नहीं मालूम कि बीच में पड़ने वाली जगहों की अल्मोड़ा वाले रास्ते की तुलना में समुद्रतल से ऊँचाई ज्यादा है या नहीं पर इस रस्ते में इतने बुराँश हमने खिले हुए देखे कि हमें लगने लगा हम कुमायूँ के चिर परिचित इलाके में नहीं फूलों की घाटी में विचरण कर रहे हैं। फूलों और रंग बिरंगे पक्षियों -- ख़ास तौर पर नीले  रंग की लम्बी पूँछ वाली लम्पुछड़िया ( फोटो भेज कर मैंने शिरीष कुमार मौर्य से इसका नाम पूछा )  की प्रचुर उपस्थिति के अलावा कम ट्रेफ़िक के कारण बच्चों में सड़क पर खेलने के दृश्य भी हमें अप्रत्याशित तौर पर खूब दिखे। जगह जगह लड़के क्रिकेट खेलते दिखे पर एक जगह ढलती शाम ...
  जीवन में बारिश बारिश को लेकर जो रुमानियत आमतौर पर हमारे खाते पीते समाज में है उसकी अभिव्यक्ति साहित्य ,संगीत और फ़िल्मों में बहुत मुखर रूप में हुई है। में नैनीताल और उसके आसपास अनवरत बारिश ने जिस तरह का कहर बरपाया उसके मद्देनज़र अभी शिरीष मौर्य ने एक पोस्ट में बारिश के साथ अनिवार्य रूप से नत्थी कर दी गयी  रुमानियत से इनकार किया तो मुझे कुछ साल पहले उनके पुराने तल्लीताल वाले घर पहली बार जाने की घटना बरबस याद आ गयी। घने कोहरे में वहाँ तक पहुँचना मुझे बहुत रोमांचित कर रहा था और जब मैंने नीचे उतर कर बादलों के कमरे में घुस आने की बाबत सम्पूर्ण आह्लाद से भर कर उनसे बात की तो शिरीष और सीमा जी ने एकसाथ कहा कि भाई साहब आप तो एक दिन के लिए आये हैं ,हम तो इस टिपटिप गीलेपन से बुरी तरह तंग आ गये हैं और  सोचते हैं ये दिन किसी तरह बीतें। जहाँ तक मुझे याद आता है मैंने एक छोटी कविता  उसदिन के गझिन कोहरे को लेकर लिखी थी,जो "अनुनाद" में शिरीष जी ने लगाईं भी थी। नैनीताल का कुहासा   ...
Image
 ज़माने की बे दिली  (अपनी दोस्तों को याद करते हुए)  कभी-कभी दो लोगों का साथ होना भी अलग तरह के संकट पैदा करता है। दो पुरानी घटनाएं मुझे याद आ रही हैं - एक बार मेरी एक मित्र ने कहा कि साथ साथ कहीं डेढ़ दो घंटे के लिए नहर किनारे घूमने चलेंगे। हमने मुख्य डाकघर के सामने निर्धारित समय पर मिलना तय किया जहां से हम फिर साथ आगे जाते। मैं वहां समय पर जाकर खड़ा हो गया, गाड़ी थोड़ी दूर पर पार्क कर दी और मित्र के आने का इंतजार करता रहा। उसके आने में करीब दस पंद्रह मिनट का विलंब हुआ लेकिन ये पंद्रह मिनट मेरे लिए बेहद मुश्किल और जी का जंजाल बन गए। छोटे से शहर में आपको जानने वाले बहुत सारे लोग होते हैं और खास तौर पर जहां आप लंबे समय से रह रहे हों, एक अच्छी जगह पर काम कर रहे हों। उस दौरान एक के बाद एक मेरे कई जानने वाले उधर से आते जाते रुके, खड़े होकर बात करते रहे - क्या बात है? कोई दिक्कत तो नहीं? आप यहां क्यों खड़े हैं, कहीं जाना हो तो मैं पहुंचा दूं? उनके सवालों के जवाब देते देते मैं थक गया और मुझे यह लगा कि किसी छोटे शहर में बेनाम और अपरिचित रहना कितना मुश्किल है, बड़े शहर में आपको कोई...