जीवन में बारिश

बारिश को लेकर जो रुमानियत आमतौर पर हमारे खाते पीते समाज में है उसकी अभिव्यक्ति साहित्य ,संगीत और फ़िल्मों में बहुत मुखर रूप में हुई है। में नैनीताल और उसके आसपास अनवरत बारिश ने जिस तरह का कहर बरपाया उसके मद्देनज़र अभी शिरीष मौर्य ने एक पोस्ट में बारिश के साथ अनिवार्य रूप से नत्थी कर दी गयी  रुमानियत से इनकार किया तो मुझे कुछ साल पहले उनके पुराने तल्लीताल वाले घर पहली बार जाने की घटना बरबस याद आ गयी। घने कोहरे में वहाँ तक पहुँचना मुझे बहुत रोमांचित कर रहा था और जब मैंने नीचे उतर कर बादलों के कमरे में घुस आने की बाबत सम्पूर्ण आह्लाद से भर कर उनसे बात की तो शिरीष और सीमा जी ने एकसाथ कहा कि भाई साहब आप तो एक दिन के लिए आये हैं ,हम तो इस टिपटिप गीलेपन से बुरी तरह तंग आ गये हैं और  सोचते हैं ये दिन किसी तरह बीतें। जहाँ तक मुझे याद आता है मैंने एक छोटी कविता  उसदिन के गझिन कोहरे को लेकर लिखी थी,जो "अनुनाद" में शिरीष जी ने लगाईं भी थी।

नैनीताल का कुहासा
                              
कई बार हम देखने पर ज्यादा जोर देते हैं
कई बार महसूस करने पर...
कचहरियों की तरह प्रमाण को जरुरी मानते हैं कुछ लोग
और पिटी हुई स्त्री की आँखों में दुबके  डर की बजाय
शरीर पर दर्ज चोट के निशान ढूँढते हैं लेंस ले कर....  
छूना, सुनना,सूँघना, चखना बीच बीच में पड़ने वाले पड़ाव  हैं.
 
बड़ी शिद्दत से ऐसे भी लोग हैं जो  चाहते हैं
कभी कभी कुछ देखें न...ऑंखें बंद किये रहें
और ठोस छुअन के साथ नंगे पाँव बिना गिरे पड़े
स्मृतियों की तंग गलियों में लम्बा चक्कर लगा कर
बिना किसी से पूछे समझ जाएँ कौन कौन गाँव छोड़ गया.
 
आँखें खुली रखने  का देखने से दरअसल कोई सम्बन्ध नहीं है
देखते हम वही हैं जो शिकारी ड्रोन सा सचमुच देखना चाहते हैं
गर्दन घूमे न घूमे,निगाह दसों  दिशाओं में घूम जाती है
फिर भी कइयों को तो शरीर से चिपके जोंक तक नहीं दिखते
हाँ,सामने बैठा शख्स तिरछी नजर पलभर में ही जरुर  भांप लेता है.
 
प्रेम  दिखाई नहीं देता सिवा आँखों की तरलता के
क्रूरता होने से पहले सिर्फ आँखों की धधक  में तैरती  है
अवसाद  को तिरछी नजर की तरह साथ के लोग देखते हैं मारते हुए  कुंडली.
उसी तरह महकता है तभी  दिखता है
कुहासा 
जब सौंप देता है अपनी सारी तरलता
रुखी सूखी पथरीली  धरती  को. 
 
मित्र लीलाधर मंडलोई की किताब "दिनन दिनन के फेर" में "बारिश और प्रेम" शीर्षक से कोयला खान मज़दूरों के जीवन में बारिश जिस तरह की मुसीबत लेकर आती है उसका एक अत्यंत मर्मस्पर्शी संस्मरण है :
और लगी लगी बारिश का आक्रमण भी  हो गया तो झुग्गी झोपड़ियाँ पानी में डूब जाती थीं। झोपड़ी में ऊपर  की तरफ़ कपड़े रखने की लकड़ियों से बनी मचान सरीखी व्यवस्था होती थी। जब झोपड़ियों में पानी भर जाता था तो ज़रूरी सामान मचान पर रख दिया जाता था। बचा खुचा खाटों पर। फिर पानी निकालने का तकलीफ़देह काम। हम  देखते थे चूल्हा पानी में डूबा। अनाज़ आटा भीगा हुआ। बर्तन पानी में तैरते। कपड़े भीगे हुए। यानि जबरन की लगभग भूख हड़ताल का मौसम। ऐसे में मदद उन घरों से आती जहाँ बारिश का ऐसा कोहराम न होता। नेह स्नेह ,सद्भाव और आपसी प्रेम के वशीभूत हो एक दूसरे की विपत्ति में काम छोड़ कर लोग उठ खड़े होते। कुछ दिनों में सहकार से जीवन कहने को सामान्य हो उठता … 

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