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Showing posts with the label # सिनेमा
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 घुटन भरे माहौल में श्वास  कल रात मराठी की बेहद मर्मस्पर्शी फिल्म "श्वास" देखी - बहुत दिनों बाद कोई मराठी फिल्म देखी। यह फिल्म मैंने दोबारा देखी, पहली बार तब देखी थी भारत की तरफ से  2004 में ऑस्कर के लिए नामित किया गया था.... इसका डी वी डी नागपुर से मंगा कर देखी थी।वास्तविक घटना पर आधारित यह फिल्म माधवी घरपुरे की कहानी पर बनी है जिसे संदीप सावंत ने निर्देशित किया है - बेहद सजीव अभिनय,सुंदर स्थलों पर की गई नयनाभिराम फोटोग्राफी और बेहद प्रभावशाली पार्श्व संगीत फ़िल्म के प्रभाव को बढ़ाते हैं।  कोरो ना की वजह से जिस तरह की घरेलू कैद में हम लोग बंद हैं और बाहर की दुनिया से सिवाय टीवी या सोशल मीडिया के हमारा संपर्क टूटा हुआ है, तब यह फिल्म देखना खुली हवा में सांस लेने जैसा था - सिर्फ शाब्दिक अर्थों में नहीं बल्कि दृश्यात्मक और गतिमान अर्थों में। नदी पहाड़ जंगल इंसान पेड़ पौधे पशु पक्षी इन सब के साथ सहज भाव से मिलना जुलना कितना आह्लादकारी था यह शब्दों में बयान करना मुश्किल है।  फिल्म एक छोटे बच्चे और उसके नाना के बेहद आत्मीय संबंधों पर आधारित है। बच्चे की आंख में कुछ स...
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 बचपन से मैं पेंटर बनना चाहता था लेकिन जीवन की दिशा कुछ ऐसी उलट-पुलट हुई और बदली कि मैं पेंटिंग छोड़ फिल्में बनाने लगा।मैंने अपना कैरियर बदला तो तब तक बनाए अपने सारे चित्र आग के हवाले कर दिए। मैं पेंटिंग को पूरी तरह से भूल जाना चाहता था, उसका नाम भी नहीं सुनने को तैयार था। एक लोकप्रिय जापानी कहावत है कि दो खरगोशों के पीछे एक साथ भागोगे तो दो क्या एक खरगोश भी हाथ नहीं आएगा। फिल्में बनाने के बाद मैंने पेंटिंग की तरफ देखा भी नहीं। लेकिन बतौर निर्देशक यह महसूस हुआ कि अपनी टीम के लोगों को मैं क्या चाहता हूं यह समझाने के लिए रफ स्केच करके दिया जाए तो उपयोगी होगा।                                                                                                 -- अकीरा कुरोसावा                       ...
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 मेरे घर की लाइब्रेरी में उपन्यास और कहानियों की किताबें बिल्कुल नई दिखती हैं क्योंकि मैं उन्हें एक बार पढ़ता हूं और अलग रख देता हूं। लेकिन लाइब्रेरी के कोने कोने में कविता की किताबें बिखरी पड़ी रखती हैं - बार बार और जाने कितनी बार उन्हें उलट-पुलट के देखता हूं और पढ़ता हूं। कविता हमेशा आपसे दूर भागती है,उसे समझना आत्मसात करना बहुत मुश्किल होता है.... जितनी बार भी आप उसे पढ़ते हैं आपके आसपास की परिस्थितियों और आपकी मानसिक दशा के हिसाब से उसके अलग-अलग अर्थ निकलते हैं।इससे बिल्कुल उल्टी बात है कि आप जब कोई कहानी या उपन्यास पहली बार पढ़ते हैं तब उसका जो अर्थ आपके दिमाग में खुलता है वह स्थायी होता है।  (मशहूर ईरानी फ़िल्मकार अब्बास किरोस्तमी का उद्धरण जिन्होंने फ़ारसी कविताओं पर दो फ़िल्में बनायीं)