अंधेरा है पर उतना घना नहीं


यूँ ही बैठे बैठे अखबार देखते हुए या टीवी पर समाचार देखते हुए यह ख्याल आया कि इतनी हिंसा, आक्रामकता, बेईमानी और दूसरों को नीचा दिखाने के भाव मन में पसर जाते हैं कि मुँह का स्वाद तो कसैला हो ही जाता है,भारतीय समाज और व्यापक तौर पर इंसानियत के बुनियादी सरोकारों पर से भरोसा उठने लगता है - सभी दिशाओं में अंधेरा ही अंधेरा दिखाई देने लगता है।सोचने लगा साठ साल के जीवन में अम्मा पिताजी और स्कूल मास्टर के बाद ऐसा कौन है जिसने मुझे मारा,अबतक जिंदा हूँ तो जाहिर है किसी के कत्ल करने से तो बचा हुआ हूँ।स्कूल में भी नाम का दो तीन बार पढ़ाई से इतर कारणों से मार खाई होगी...विद्यार्थी ठीक ठाक से ऊपर का था।सोचने पर जैसे मुझे हुआ मित्रों को भी जान के अचरज होगा कि इतने सालों में सिर्फ़ एकबार वह भी इंजीनियरिंग कॉलेज (हाँ,भागलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज की बात है) के फ़र्स्ट या सेकंड ईयर में मेरे गाल पर रायचौधरी सर(इलेक्ट्रिकल मशीन पढ़ाने वाले प्रो मदन मोहन रायचौधरी) ने सेशनल के दौरान हल्के से चपत जड़ दी थी - हुआ यह कि वाइवा में उनके पूछे किसी सवाल का जवाब मैं नहीं दे पाया था।बात दरअसल यह हुई कि मेरे जवाब न देने पर उन्होंने डाँटा कि पढ़ के क्यों नहीं आये,मैंने सही सही बता दिया कि पढ़ा था पर यहाँ आने पर जवाब दिमाग से फिसल गया पर उन्होंने माना यही कि मैं बहाने बनाते हुए झूठ बोल रहा हूँ और मुझे चपत लगा दी...झूठा ठहराये जाने पर मुझे बहुत चोट लगी और मैं रोता हुआ क्लास से निकल गया।घर पहुँचा तो सर मेरे घर बैठे बाहर से दिख गए...पहले कभी नहीं आये थे।मैंने उन्हें देख अपनी साइकिल घुमा ली और उनसे बचने के लिए किसी दोस्त के घर चला गया...दो घण्टे बिता कर जब घर आया तो घुसते ही अम्मा ने बताया कि सर आये थे और बहुत अफ़सोस कर रहे थे कि मैंने आज यादवेन्द्र को झूठा समझ कर चपत लगा दी पर बाद में उसके फूट पड़ने पर मुझे महसूस हुआ कि मैं गलत था....वे सारा किस्सा पिताजी अम्मा को बता चुके थे और अपने घर का पता छोड़ गए थे कि वह जैसे ही घर आये मेरे घर भेज दीजिये।में सहमा सहमा उनके घर गया तो उन्होंने भावुक होकर गले लगा लिया और मुझे बगैर खाना खाये लौटने नहीं दिया।वे जिस तरह दिल लगा कर पढ़ाते थे उतने ही उम्दा इंसान भी थे - अनुकरणीय।कॉलेज छोड़ने के कोई बीस साल बाद मैं दुबारा गया तो उनसे मिला और उन्हें रुड़की आने का निमंत्रण देकर आया था पर उनका आना होना नहीं था....
इस घटना के बहाने उस अनूठे गुरु को प्रणाम करना मुझे अंदर तक भिगो और शुद्ध कर रहा है....मार काट और नकारात्मक छवि वाली दुनिया में बस यह इकलौती चपत याद आ पा रही है।

इससे जुड़ा एक मुद्दा और मुझे याद आ रहा है इतने दिनों की नौकरी और भ्रमण में  - नौकरी से संबंधित और उससे इतर भी -  घूमना मेरे जीवन में एक बहुत अहम भूमिका में रहा है। तो इतनी यात्राओं में कभी मेरा सामान नहीं चोरी हुआ - बस एक बार दिल्ली के अलावा।नई नई नौकरी रुड़की में मैंने शुरू की थी, दिल्ली जा रहा था बस से और आईएसबीटी में मेरा सामान किसी ने उठा लिया। और एक बार मैं ऐसे ही जयपुर जा रहा था - ये उन दिनों की बात है जब ट्रेन में रिजर्वेशन के लिए लंबी लाइन लगती थी। लाइन में खड़ा था और जब मेरी बारी आई तो पैसे निकालने के लिए  अंदर की  जेब में उंगलियां डाली तो वहां जो पैसे रखे थे  किसी जेब कतरे ने ब्लेड से काट कर निकाल लिए थे। ये घटनाएं मेरी मुझे याद आ रही है इतने लंबे जीवन में, इतनी यात्राओं के बीच जो मेरे मेरा नुकसान हुआ...वह भी पूरी तरह अहिंसक नुकसान हुआ।
 एक और  दिलचस्प घटना मुझे याद आ रही है - मुगलसराय स्टेशन पर स्लीपर क्लास की खिड़की वाली सीट पर मैं अख़बार रख के कुछ खाने को खरीदने नीचे उतरा और जब लौट कर आया तो एक नंग धड़ंग नौजवान ने मेरा अख़बार उठाकर खूब कसके उसको पकड़ रखा था।जब मैंने उससे मांगा तो उसने दिया नहीं, फिर मैंने हाथ लगाकर उसको वापस लेना चाहा लेकिन जिस तरह से उसने उस अखबार को पकड़ा था उससे और उसकी वेशभूषा से उसके हाव-भाव से मुझे लग गया कि वह सामान्य मनोदशा वाला व्यक्ति नहीं है, कुछ मानसिक परेशानियों का शिकार है। इसलिए मैंने उसे अखबार पकड़े रहने दिया। थोड़ी देर के बाद वह अखबार लेकर दूर चला गया और जाते हुए इस दृष्टि से उसने मुझे देखा जैसे बहुत बड़ी विजय हासिल करके जा रहा हो। उस समय ढाई तीन रू अख़बार की कीमत थी, यही उसकी जीत का हासिल था।बस, यही इतने लंबे जीवन में मुझसे किसी ने छीन लिया।

क्या करूँ....कैसे मानूँ कि अंधेरा इतना घना हो गया है कि इंसानियत दम घुट कर मर गयी है!!

( आज जैसे उदास और बेचैन पलों में लिखा डायरी का एक पन्ना) 

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