नींबू के फाँक सा बँटा हुआ है समाज अभी चंद्रकांत देवताले की एक किताब "आकाश की जात बता भैया"( 2010) पढ़ रहा था तो इसमें नींबू जैसी मामूली चीज को लेकर दो बेहद महत्वपूर्ण कविताएं मुझे मिलीं जो हमारे आज के समाज को बहुत गहरे सरोकारों के साथ अभिव्यंजित करती हैं -वैसे ही जैसे नींबू दूध का दूध और पानी का पानी कर देता है। ऐसे यह बात अविश्वसनीय लग सकती है कि नींबू जैसे रूपक से हम आज के अपने अनगिनत परतों वाले समाज को समाज शास्त्रीय मानदंडों पर परिभाषित कर सकते हैं। इनमें से एक कविता है "एक नींबू के पीछे" जो किसी संभ्रांत कॉलोनी में किसी बड़े हाकिम के अहाते में दिहाड़ी मजदूरी पर काम करने वाली एक चालीस साल की औरत को अपराधी साबित करने के षडयंत्र का मंजर रचती है। एक बड़े हाकिम की पत्नी बाई साहब और उनके दोनों नौकर एक नींबू दिखा कर उस औरत को बड़ा चोर साबित करने की कोशिश कर रहे हैं जो उसने तोड़ा नहीं बल्कि जमीन से गिरा हुआ उठाया था। कहने को तो वे बड़े हाकिम की पत्नी बा...