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                                     नींबू के फाँक सा बँटा हुआ है समाज  अभी चंद्रकांत देवताले की एक किताब "आकाश की जात बता भैया"( 2010) पढ़ रहा था तो इसमें नींबू जैसी मामूली चीज को लेकर दो बेहद महत्वपूर्ण कविताएं मुझे मिलीं जो हमारे आज के समाज को बहुत गहरे सरोकारों के साथ अभिव्यंजित करती हैं -वैसे ही जैसे नींबू दूध का दूध और पानी का पानी कर देता है। ऐसे यह बात अविश्वसनीय लग सकती है कि नींबू जैसे रूपक से हम आज के अपने अनगिनत परतों वाले समाज को समाज शास्त्रीय मानदंडों पर परिभाषित कर सकते हैं। इनमें से एक कविता है "एक नींबू के पीछे" जो किसी संभ्रांत कॉलोनी में किसी बड़े हाकिम के अहाते में दिहाड़ी मजदूरी पर काम करने वाली एक चालीस साल की औरत को अपराधी साबित करने के षडयंत्र का मंजर रचती है। एक बड़े हाकिम की पत्नी बाई साहब और उनके दोनों नौकर एक नींबू दिखा कर उस औरत को बड़ा चोर साबित करने की कोशिश कर रहे हैं जो उसने तोड़ा नहीं बल्कि जमीन से गिरा हुआ उठाया था। कहने को तो वे बड़े हाकिम की पत्नी बा...
  इंदोनेशिया की कविता  बरसात के आँसू                                              -- एगुस सर्जोनो  "मुझसे किसी पर निशाना मत लगाओ" : एक राइफल गिड़गिड़ाता है  डर से काँपता है। "चुप बे साले",  हाथ चीखता हुआ धमकी देता है: "मुझे उन बच्चों को गोली से उड़ाना ही है।" "पर देखो तो,वे अभी कितनी कम उम्र के हैं उनके चेहरों पर कैसी प्यारी किशोर मुस्कान है और ऐसा भला वे माँग  भी क्या रहे हैं? उनकी माँग में तुम्हारी भलाई भी शामिल है... तुम ही तो जब देखो तब अपनी मामूली सी पगार को लेकर  हुकूमत को गालियाँ  दिया करते थे तुम्हारे पास बेहतर जीवन का कोई और मौका भी नहीं तुम्हीं तो झींक रहे थे कि मुट्ठी भर भात के लिए  कभी यहाँ  कभी वहाँ  कैसे कैसे पापड़ बेलने पड़ते हैं।" "मुझसे किसी पर निशाना मत लगाओ "': राइफल फिर रोता है घिघियाता है। "अबे अपना मुँह बंद रख",  हाथ उसे घुड़क देता है: "तुझे सियासत क्या मालूम  यह एक सियासी ...
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 मैं कविताओं को देखता भी हूँ  मैंने पहले भी इस बात की चर्चा की है कि कुछ कविताएँ चाहे छोटी हों या बड़ी - बेहद दृश्यात्मक होती हैं,विज़ुअल होती हैं। उन्हें पढ़ने के साथ आप देख भी सकते हैं ।कहानियों में ढूँढें तो बहुतेरे मामलों में दृश्यात्मकता मिल सकती है - आप एक पैराग्राफ पढ़ते हुए या एक-एक वाक्य पढ़ते हुए चीजों को मन ही मन घटते हुए देखते रहते हैं,  लेकिन कविताओं के साथ यह है विरल है। लेकिन हमारे कुछ कवियों की कुछ कविताएँ ऐसी हैं जिनके बारे में मैं हमेशा से मानता हूँ कि वह जैसे शब्दशः पढ़ी जा सकती हैं वैसे ही फ़्रेम दर फ़्रेम देखी भी जा सकती हैं। ऐसी ही कई कविताएँ हैं अक्सर उन कविताओं की मित्रों के बीच चर्चा करता रहता हूँ - जैसे राजेश जोशी की कविता 'बिजली सुधारने वाले के बारे में' या 'बिजली का मीटर पढ़ने वाले से बातचीत' या  'प्रौद्योगिकी की माया'...उनकी एक और ऐसी ही कविता है 'प्लम्बर'।चंद्रकांत देवताले की 'बालम ककड़ी बेचने वाली लड़कियाँ' या ' बेटी के घर से लौटना'।नरेश सक्सेना की ऐसी कई कविताएँ हैं : 'चंबल एक नदी का नाम','पानी क्या कर...