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 बचपन से मैं पेंटर बनना चाहता था लेकिन जीवन की दिशा कुछ ऐसी उलट-पुलट हुई और बदली कि मैं पेंटिंग छोड़ फिल्में बनाने लगा।मैंने अपना कैरियर बदला तो तब तक बनाए अपने सारे चित्र आग के हवाले कर दिए। मैं पेंटिंग को पूरी तरह से भूल जाना चाहता था, उसका नाम भी नहीं सुनने को तैयार था। एक लोकप्रिय जापानी कहावत है कि दो खरगोशों के पीछे एक साथ भागोगे तो दो क्या एक खरगोश भी हाथ नहीं आएगा। फिल्में बनाने के बाद मैंने पेंटिंग की तरफ देखा भी नहीं। लेकिन बतौर निर्देशक यह महसूस हुआ कि अपनी टीम के लोगों को मैं क्या चाहता हूं यह समझाने के लिए रफ स्केच करके दिया जाए तो उपयोगी होगा।                                                                                                 -- अकीरा कुरोसावा                       ...
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 मेरे घर की लाइब्रेरी में उपन्यास और कहानियों की किताबें बिल्कुल नई दिखती हैं क्योंकि मैं उन्हें एक बार पढ़ता हूं और अलग रख देता हूं। लेकिन लाइब्रेरी के कोने कोने में कविता की किताबें बिखरी पड़ी रखती हैं - बार बार और जाने कितनी बार उन्हें उलट-पुलट के देखता हूं और पढ़ता हूं। कविता हमेशा आपसे दूर भागती है,उसे समझना आत्मसात करना बहुत मुश्किल होता है.... जितनी बार भी आप उसे पढ़ते हैं आपके आसपास की परिस्थितियों और आपकी मानसिक दशा के हिसाब से उसके अलग-अलग अर्थ निकलते हैं।इससे बिल्कुल उल्टी बात है कि आप जब कोई कहानी या उपन्यास पहली बार पढ़ते हैं तब उसका जो अर्थ आपके दिमाग में खुलता है वह स्थायी होता है।  (मशहूर ईरानी फ़िल्मकार अब्बास किरोस्तमी का उद्धरण जिन्होंने फ़ारसी कविताओं पर दो फ़िल्में बनायीं)