अपने यहीं दोनों जहाँ इसके सिवा जाना कहाँ..
उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में अपना घर बार छोड़कर दूर देश जा कर गुमनामी भरी नई जिंदगी की चुनौतियाँ स्वीकार करते हुए गिरमिटिया मजदूर महीनों की कठिन और अमानवीय समुद्र यात्रा में आनंद और उत्सव भी मनाते थे इसके विवरण तत्कालीन दस्तावेजों में बहुत कम मिलते हैं।प्रख्यात भारतीय अंग्रेजी लेखक अमिताभ घोष अपने बहुत चर्चित उपन्यास "सी आफ पॉपीज" में मारीच टापू (मॉरीशस) जाते बिहारी गिरमिटिया मजदूरों को शादी के बहाने ऐसा ही उत्सव मनाते दिखाते हैं।
साहिबगंज( अब झारखंड में) से नाव पर सवार एक आदिवासी युवक और छपरा से अपनी यात्रा शुरू करने वाली हीरू नाम की स्त्री की बीच यात्रा शादी संपन्न कराते हुए अलग-अलग इलाकों से आए हुए अलग-अलग जाति बिरादरी और उम्र के अपरिचित गिरमिटिया मजदूर जिस तरह की सामूहिकता और मानवीय सरोकार का परिचय देते हैं वह जीवन के प्रति उनके अनुराग चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी विकट और कठिन हों, का ज्वलंत प्रमाण है।
शादी के उत्सव के लिए अलग से कोई जगह तो थी नहीं, सो जहाज पर गिरमिटिया मजदूरों की रहने की जगह को ही दो हिस्सों में बाँट दिया गया - एक हिस्सा दूल्हे का दूसरा दुल्हन का और सहयात्रियों के ऊपर यह फैसला छोड़ दिया गया कि वह जिस पक्ष से शामिल होना चाहें शामिल हो सकते हैं। सबने कलुआ के ऊपर दुल्हन पक्ष के मुखिया होने का दायित्व डाल दिया और वह अपने कुछ साथियों के साथ हीरू के हिस्से में तिलक लेकर गया। तिलक चढ़ाने की रस्म अदा की गई और सभी तिलकहरुओ के सिर पर लाल अबीर लगाया गया।
इसके बाद गाने बजाने का कार्यक्रम शुरू हुआ। औरतों को लग रहा था कि और चीजों में भले ही न हो लेकिन संगीत के मामले में वे मर्दो को आसानी से पछाड़ देंगी लेकिन कार्यक्रम शुरू होते ही उन्हें लगने लगा कि या उनका निराधार अति उत्साह था। हुआ यह कि मर्दों के दल में 4-5 ऐसे अहीर नौजवान थे जिनका गाने बजाने में कोई सानी नहीं था। किसी भी तरह से उनको पटखनी देना औरतों के बूते की बात नहीं थी।
उठल बा छाती के जोबनवा
पिया के खेलऊना रे होई
और तो और एक अहीर नौजवान तो यात्रा से पहले प्रोफेशनल लौंडे का काम करता था। जब साथियों के उकसावे पर वह नाचने खड़ा हुआ तो अचरज से सबके मुँह खुले के खुले रह गए।
नाच में उसके पास न तो कोई मेकअप था न कॉस्टयूम लेकिन थिरकने के लिए खुशी मनाने के लिए इन सब की अनिवार्यता थोड़े थी। हालाँकि डेक के उस पिछले हिस्से में जहाँ यह सब मौज मस्ती हो रही थी, वहाँ कोई खुली जगह तो थी नहीं लेकिन उसमें शामिल सभी लोग थोड़ा थोड़ा दबे खिसके और नाचने के लिए कामचलाऊ जगह बना ही दी। वह जगह इतनी छोटी थी कि नाचते हुए वह कभी इस से कभी उस से टकराता था लेकिन शादी के समारोह में शामिल मजदूरों की हँसी खुशी में उत्साह में इन कमियों और सीमाओं से कोई असर नहीं पड़ा।
नाचने का यह पराक्रम देखकर औरतों के दल को फौरन समझ आ गया कि यदि उन्होंने अपने श्रेष्ठ हुनर का प्रदर्शन नहीं किया तो बड़ी शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी।औरतों के पक्ष की अगुवाई दीती कर रही थी जिसे सभी औरतें भौजी कहती थीं।वे किसी भी सूरत में मर्दो से पिछड़ना नहीं चाहती थीं। वह सभी औरतों को इकट्ठा करके कोई तरकीब ढूँढ़ने की कोशिश कर रही थी - यदि औरतें इस मौके पर पिछड़ गईं तो बेचारी हीरू कभी सिर उठाकर नहीं चल पाएगी।
वह शादी कैसी जिसमें हल्दी न दिखाई दे लेकिन अपने देश से दूर बीच समुद्र में हल्दी मिले कहाँ ? सरजू अपनी गठरी में से हल्दी की कुछ गाँठें निकाल कर ले आई और शादी के समारोह को शुभ रंग प्रदान कर दिया। हल्दी तो मिल गई पर उसे पीसा कैसे जाए, यह बड़ी समस्या थी - जहाज पर न तो पत्थर था न पक्की फर्श थी कि उसपर रगड़ कर काम चलाया जा सके। किसी ने एक नायाब तरकीब सुझाई - लोटे की निचली बारी से हल्दी को दबा कर छोटे छोटे टुकड़ों में तोड़ा जा सकता है और पानी मिला कर काम चलाऊ लेप बनाया जा सकता है...शादी बगैर दूल्हा दुल्हन को हल्दी लगाए कैसे संपन्न हो सकती है। जब ऐसा किया गया तो कोई भी गिरमिटिया ऐसा नहीं था जिसके चेहरे पर मुस्कान न आ गई हो।
अब बड़ी चुनौती थी कि सात फेरे लेने के लिए हवन कुंड जहाज पर कैसे बनाया जाए। वहाँ यात्रियों के लिए जो लालटेनें रखी गई थीं बस काम चलाऊ और टूटी फूटी थीं - शादी जैसे शुभ काम में उनका प्रयोग किसी अप शकुन सरीखा होता सो दीती ने तरकीब निकाली कि जिसके पास मोमबत्तियाँ हों वह लेकर आए। एक थाली में जितनी मोमबत्तियाँ लगाई जा सकती थीं, दीती ने लगाईं। यह तो हो गया लेकिन पूर्णिमा के चाँद के सामने समुद्र की ऊँची लहरों में जहाज जिस तरह से डगमगा रहा था उससे दीती के हाथ से ताली फिसल कर नीचे गिर जाने का अंदेशा था। इससे बचने के लिए यह तय किया गया कि मोमबत्तियों वाली थाली मर्दों के मजबूर हाथों में रहेगी तभी सुरक्षित रहेगी। थाली थामने के लिए जब एक नहीं कई उम्मीदवार आगे बढ़ आए तो यह फैसला किया गया कि कोई एक आदमी नहीं बल्कि छः लोग मिलकर हर तरफ से थाली को पकड़ें। ऊँची उठती लहरों का आवेग इतना था कि जहाज झटके से कभी एक तरफ झुकता था तो कभी दूसरी तरफ... यहाँ तक कि दूल्हा दुल्हन भी सीधे खड़े नहीं हो पा रहे थे।बचते बचाते भी वे दोनों गिर ही पड़े।
दूल्हा दुल्हन को उठाकर थामने के लिए कई साथी सामने आ गए और उन्होंने एक गोल घेरा बना कर उन्हें सहारा दिया। फेरों की रस्म पूरी करने के बाद दूल्हा दुल्हन को कोहबर के अंदर पहुँचाया गया।उनके अंदर जाने के बाद भी गाना बजाना देर तक चलता रहा।

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