ज़माने की बे दिली
(अपनी दोस्तों को याद करते हुए)
कभी-कभी दो लोगों का साथ होना भी अलग तरह के संकट पैदा करता है। दो पुरानी घटनाएं मुझे याद आ रही हैं - एक बार मेरी एक मित्र ने कहा कि साथ साथ कहीं डेढ़ दो घंटे के लिए नहर किनारे घूमने चलेंगे। हमने मुख्य डाकघर के सामने निर्धारित समय पर मिलना तय किया जहां से हम फिर साथ आगे जाते। मैं वहां समय पर जाकर खड़ा हो गया, गाड़ी थोड़ी दूर पर पार्क कर दी और मित्र के आने का इंतजार करता रहा। उसके आने में करीब दस पंद्रह मिनट का विलंब हुआ लेकिन ये पंद्रह मिनट मेरे लिए बेहद मुश्किल और जी का जंजाल बन गए। छोटे से शहर में आपको जानने वाले बहुत सारे लोग होते हैं और खास तौर पर जहां आप लंबे समय से रह रहे हों, एक अच्छी जगह पर काम कर रहे हों। उस दौरान एक के बाद एक मेरे कई जानने वाले उधर से आते जाते रुके, खड़े होकर बात करते रहे - क्या बात है? कोई दिक्कत तो नहीं? आप यहां क्यों खड़े हैं, कहीं जाना हो तो मैं पहुंचा दूं? उनके सवालों के जवाब देते देते मैं थक गया और मुझे यह लगा कि किसी छोटे शहर में बेनाम और अपरिचित रहना कितना मुश्किल है, बड़े शहर में आपको कोई नहीं जानता। थोड़ी देर के बाद मैंने देखा कि मेरी मित्र आते-आते ठिठक के दूर खड़ी हो गईं और जब सबको निबटा दिया मैंने तब हम वहां से निकल पाए। आपके इतने शुभचिंतक होते हैं छोटे शहर में कि आपकी निजता बिल्कुल ही रह नहीं जाती।
ऐसे ही एक बार कुछ ऐसा संयोग बना कि मैं और मेरी एक दूसरी दोस्त दोनों अपने अपने कामों से दिल्ली में थे और वहां फोन से यह पता चला कि बेहद चर्चित नाटक "तुम्हारी अमृता" (फिरोज़ अब्बास खान के निर्देशन में जावेद सिद्दीकी का लिखा नाटक) उसी शाम इंडिया हैबिटेट सेंटर में होने वाला है।यह मालूम होने पर कि हम दोनों दिल्ली में हैं, हम ने आनन-फानन में यह कार्यक्रम बनाया कि नाटक में मिलते हैं और साथ-साथ नाटक देखेंगे। मुझे अच्छी तरह याद है यह वह समय था जब दीपा मेहता की किसी फिल्म के लिए(शायद "अर्थ") शबाना आजमी ने अपने बाल कटवा लिए थे (हिंदूवादी बवालियों ने वह फ़िल्म भारत में बनने नहीं दी) । इस नाटक में अभिनय करते हुए भी वे बहुत छोटे बालों में मंच पर उपस्थित थीं। फारुख शेख का उस समय अपना जलवा था। नाटक का उद्घाटन लालकृष्ण आडवाणी ने किया था - राजनीतिक रूप में लालकृष्ण आडवाणी और शबाना आजमी तब भी दो विपरीत ध्रुवों पर थे लेकिन इस नाटक में जैसी गहरी आत्मीयता और परस्पर सम्मान से दोनों मिले वह मुझे खूब याद है। आज की तरह वैचारिक विरोध व्यक्तिगत दुश्मनी में तब नहीं तब्दील हुई थी। हमें बड़ी मुश्किल से सबसे महंगा टिकट मिल पाया था। हैबिटेट सेंटर का पूरा हॉल खचाखच भरा था। हम साथ-साथ नाटक देखने बैठे पर जब देखा कि वीडियो कैमरे पूरे हॉल में घूम घूम कर तस्वीरें ले रहे हैं मंच की और दर्शकों की भी तो हमें एकदम से यह लगा कि कहीं इस नाटक के दर्शकों के बीच हम दोनों की साथ साथ बैठी हुई तस्वीर अखबारों में या टीवी में प्रसारित हो कर रुड़की न पहुंच जाए - मेरा तो नहीं लेकिन मेरी दोस्त की इससे मुश्किलें बढ़ सकती हैं। पूरे नाटक के दौरान हम चौकन्ने और असहज ही रहे - जब भी कैमरे का रुख हमारी तरफ होता तो हम बिल्कुल अपरिचित दर्शकों की तरह बैठे रहने का प्रयत्न करते या चेहरे पर रूमाल रख कर शक्ल छुपाने की कोशिश करते।
सहज रूप में साथ की आस लगाने वाले इंसान के लिए ये साथ कितनी बार फांस बन जाते हैं...

अच्छा है
ReplyDeleteभाई, अब देखा करुंगा।आंखों को चाहिए, वह इधर
ReplyDeleteहोगा।यह दिल में उतरने वाली सामग्री का मोहताज है।
महामारी ने जीवन की कोमलता और रोमान के
साथ जो किया है,भयावह है।