मैं कविताओं को देखता भी हूँ 



मैंने पहले भी इस बात की चर्चा की है कि कुछ कविताएँ चाहे छोटी हों या बड़ी - बेहद दृश्यात्मक होती हैं,विज़ुअल होती हैं। उन्हें पढ़ने के साथ आप देख भी सकते हैं ।कहानियों में ढूँढें तो बहुतेरे मामलों में दृश्यात्मकता मिल सकती है - आप एक पैराग्राफ पढ़ते हुए या एक-एक वाक्य पढ़ते हुए चीजों को मन ही मन घटते हुए देखते रहते हैं,  लेकिन कविताओं के साथ यह है विरल है। लेकिन हमारे कुछ कवियों की कुछ कविताएँ ऐसी हैं जिनके बारे में मैं हमेशा से मानता हूँ कि वह जैसे शब्दशः पढ़ी जा सकती हैं वैसे ही फ़्रेम दर फ़्रेम देखी भी जा सकती हैं। ऐसी ही कई कविताएँ हैं अक्सर उन कविताओं की मित्रों के बीच चर्चा करता रहता हूँ - जैसे राजेश जोशी की कविता 'बिजली सुधारने वाले के बारे में' या 'बिजली का मीटर पढ़ने वाले से बातचीत' या  'प्रौद्योगिकी की माया'...उनकी एक और ऐसी ही कविता है 'प्लम्बर'।चंद्रकांत देवताले की 'बालम ककड़ी बेचने वाली लड़कियाँ' या ' बेटी के घर से लौटना'।नरेश सक्सेना की ऐसी कई कविताएँ हैं : 'चंबल एक नदी का नाम','पानी क्या कर रहा है','गिरना' इत्यादि।लीलाधर मंडलोई की 'घरेलू मक्खी','घोड़ानक्कास' और 'राग सतपुड़ा' की अनेक रचनाएँ।लीलाधर जगूड़ी की 'सुबकना','छाता','सिल्ला 1 और चिल्ला 2 गाँव' इत्यादि,मंगलेश डबराल की 'टॉर्च','गुड़हल',पिता का चश्मा'इत्यादि।
यह कोई आधिकारिक सूची नहीं बनाई मैंने, बस उन कविताओं के नाम गिनाए जो मेरी तात्कालिक स्मृति में दर्ज थीं।
ऐसी ही एक कविता है - अनामिका जी की 'चुटपुटिया बटन'...जहाँ तक मुझे मालूम है यह उनकी शुरुआती कविताओं में से एक है,या यों कहें कि बतौर कवि अनामिका जी से मेरी पहचान इसी कविता से शुरू हुई थी।उसके बाद अपनी रचनाशीलता और वैचारिकता के  एक के बाद एक परचम गाड़ती हुई वे नए शिखरों तक पहुँचीं पर मेरे लिए अनामिका जी तक पहुँचने का 'दरवाज़ा' 'सुई' ,'चौका'और 'चुटपुटिया' बटन से ही खुलता है।

चुटपुटिया बटन

मेरा भाई मुझे समझा कर कहता था :
जानती है पूनम, तारे हैं चुटपुटिया बटन 
रात के अंगरखे में टँके हुए।

मेरी तरफ प्रेस बटन को चुटपुटिया बटन 
कहा जाता था 
क्योंकि 'चुट' से केवल एक बार 'पुट' बजकर 
एक दूसरे में समा जाते थे वे। 
वे तभी तक होते थे काम के 
जब तक उनका साथी 
चारों खूँटों से बराबर 
उनके बिल्कुल सामने रहे टँका हुआ 
ऊँच-नीच के दर्शन में उनका कोई विश्वास नहीं था 
बराबरी के वे कायल थे 
फँसते थे न फँसाते थे 
चुपचाप सट जाते थे। 

मेरी तरफ प्रेस बटन को चुटपुटिया बटन 
कहा जाता था 
लेकिन मेरी तरफ के लोग खुद भी थे 
चुटपुटिया बटन -
'चुट' से 'पुट' बज कर सट जाने वाले ।

इस शहर में लेकिन 'चुटपुटिया' नजर ही नहीं आते 
सतपुतिया झिंगुनी की तरह 
यहाँ एक सिरे से गायब हैं 
चुटपुटिया: जन और बटन 
ब्लाउज में भी दर्जी देते हैं टाँक यहाँ हुक ही हुक
हर हुक के आगे विराजमान होता है फंदा 
फंदे में फँसे हुए आपस में कितना सटेंगे 
कितना भी कीजिए जतन 
'चुट' से 'पुट' नहीं ही बजेंगे।

(तस्वीर अम्मा के खजाने की है) 

# कविता

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